. Sri Dasam Granth Sahib Verse
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Sri Dasam Granth Sahib Verse

ਤਜਿਹੂੰ ਨ ਸਕੈ ਰਮਿਹੂੰ ਨ ਸਕੈ ਇਹ ਭਾਂਤਿ ਕੀ ਆਨਿ ਬਨੀ ਦੁਚਿਤਾਈ ॥

(And contemplated,) ‘Neither I can accept her, nor can I leave, I am in a fix now.

तजिहूं न सकै रमिहूं न सकै इह भाति की आनि बनी दुचिताई ॥


ਬੈਠ ਸਕੈ ਉਠਿਹੂੰ ਨ ਸਕੈ ਕਹਿਹੂੰ ਨ ਸਕੈ ਕਛੁ ਬਾਤ ਬਨਾਈ ॥

‘Neither, I can sit nor get up, such a situation has arisen.

बैठ सकै उठिहूं न सकै कहिहूं न सकै कछु बात बनाई ॥


ਤ੍ਯਾਗਿ ਸਕੈ ਗਰ ਲਾਗਿ ਸਕੈ ਰਸ ਪਾਗਿ ਸਕੈ ਨ ਇਹੈ ਠਹਰਾਈ ॥

‘Neither I can abandon her, nor I can relish her in such a condition.

त्यागि सकै गर लागि सकै रस पागि सकै न इहे ठहराई ॥


ਝੂਲਿ ਗਿਰਿਯੋ ਛਿਤ ਭੁਲ ਗਈ ਸੁਧਿ ਕਾ ਗਤਿ ਮੋਰੇ ਬਿਸ੍ਵਾਸ ਬਨਾਈ ॥੧੨॥

‘I have been downed to doom and all my perceptibility has abandoned me.’

झूलि गिरियो छित भुल गई सुधि का गति मोरे बिस्वास बनाई ॥१२॥